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कितनी ग्राम ज़िन्दगी,
सारी तमाम ज़िन्दगी.

सुनी सकल पकडंडीयां,
राही का नाम ज़िन्दगी.

निकला था जोश में सुबह,
काटे है शाम ज़िन्दगी.

करता रहा सब बेसबब,
दर्द-ओ-हराम ज़िन्दगी.

जागे हैं फिर से धुंध में,
कैसी बदगुमान ज़िन्दगी.

तोडा है प्याला फिर करे,
साकी आराम ज़िन्दगी.

बची खुची जो भी मिली,
बेचीं सरे-आम ज़िन्दगी.

कैसे करूँ समझा मुझे,
अब एहतेराम ज़िन्दगी.

Image Source : La Vida